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Showing posts from March, 2023

Shiv panchakshar stotra

 ॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥ नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय । नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥ मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय, नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय । मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय, तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥ शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द, सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय । श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥ वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य, मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय, तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥ यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय । दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥ पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ । शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

Netropanisad

 नेत्रोपनिषद स्तोत्र    इसका प्रतिदिन पाठ करने से नेत्र ज्योति ठीक रहती है तथा खोई हुई ज्योति पुनः प्राप्त होती है !     नेत्रोपनिषद स्तोत्र : ॐ नमो| भगवते सूर्याय अक्षय तेजसे नमः|   ॐ खेचराय नमः| ॐ महते नमः| ॐ रजसे नमः|   ॐ असतोमासद्गामय| तमसोमा ज्योतिर्गमय| मृत्योर्मामृतंगामाया| उष्णो भगवानम शुचिरुपः| हंसो भगवान हंसरुपः|   इमाम चक्शुश्मती विध्याम ब्राम्हणोंनित्यमधिते| न तस्याक्षिरोगो भवति न तस्य कुलेंधो भवति|   अष्टो ब्राम्हानान प्राहाइत्व विध्यासिद्धिर्भाविश्यती| ॐ विश्वरूपा घ्रिनानतम जातवेदा सन्हीरान्यमयाम ज्योतिरूपमायाम|   सहस्त्रराशिम्भिः शतधा वर्तमानः पुनः प्रजाना| मुदयातेश्य सूर्यः|   ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहन वाहनाय स्वाहा| हरिओम तत्सत ब्राम्हानें नमः|   ॐ नमःशिवाय|

Chakshusopanisad

 विनियोग मंत्र *ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुधन्य ऋषिः गायत्री छन्दः सूर्यो देवता चक्षुरोगनिवृत्तये विनियोगः। चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र ~ "ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरितम् चक्षुरोगान शमय शमय। मम जातरूपम् तेजो दर्शय दर्शय। यथाहम अन्धो न स्यां कल्पय कल्पय। कल्याणम कुरु कुरु। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानी चक्षुः प्रतिरोधकदुष्क्रतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय।" - ~ "ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। ~ असतो मां सदगमय। तमसो मां ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।" - ~ "उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः। हंसो भगवान शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चक्षुष्मतिविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुल अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।"

Aditya hridaya stotra

 सम्पूर्ण आदित्य हृदय स्त्रोत  ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥ दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥ राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥ आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥ सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥ रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥ सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥ पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥ आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥ हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥ हिरण्यगर्भ: ...

Rudrastkam

 नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम् । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम् ॥   निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम् ॥   तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् । स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥   चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् । मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥   प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम् । त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम् ॥   कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी। चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥   न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वं भूताधि वासं ॥   न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम् सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम् । जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोप...

Shiv tandav stotram

 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥ जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥ धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥ जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥ सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥ ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥ करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके । धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक प्रकल्पनैकशिल...

Arati shree ramayan ji ki

 आरती श्री रामायण जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥ गावत ब्रहमादिक मुनि नारद । बाल्मीकि बिग्यान बिसारद ॥ शुक सनकादिक शेष अरु शारद । बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥ ॥ आरती श्री रामायण जी की..॥ गावत बेद पुरान अष्टदस । छओं शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥ मुनि जन धन संतान को सरबस । सार अंश सम्मत सब ही की ॥ ॥ आरती श्री रामायण जी की..॥ गावत संतत शंभु भवानी । अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥ ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी । कागभुशुंडि गरुड़ के ही की ॥ ॥ आरती श्री रामायण जी की..॥ कलिमल हरनि बिषय रस फीकी । सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ॥ दलनि रोग भव मूरि अमी की । तात मातु सब बिधि तुलसी की ॥ आरती श्री रामायण जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥

Jag janani jay jay

 जगजननी जय जय माँ जगजननी जय जय माँ जगजननी जय जय ॥ भयहारिणि भवतारिणि भवभामिनि जय जय ॥ तू ही सत चित सुखमय शुद्ध ब्रह्मरूपा । सत्य सनातन सुंदर परशिव सुर भूपा ॥1॥ आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी । अमल अनंत अगोचर अज आनंदराशी ॥2॥ अविकारी अघहारी अकल कलाधारी । कर्ता विधि भर्ता हरि हर संहारकारी ॥3॥ तू विधिवधू रमा तू उमा महामाया । मूल प्रकृति विद्या तू तू जननी जाया ॥4॥ राम कृष्ण तू सीता वृजरानी राधा । तू वाञ्छाकल्पद्रुम हारिणि सब बाधा ॥5॥ दशविद्या नवदुर्गा नाना शस्त्र करा । अष्ट मातृका योगिनि नव नव रूप धरा ॥6॥ तू परधामनिवासिनि  महाविलासिनि तू। तू ही श्मशान विहारिणि ताण्डवलासिनि तू ॥7॥ सुर मुनि मोहिनि सौम्या तू शोभाआ्धारा। विवसन विकट सरूपा प्रलयमयी धारा ॥8॥ तू ही स्नेह सुधामयि तू अति गरलमना । रत्नविभूषित तू ही तू ही अस्थितना ॥9॥ मूलाधार निवासिनि इह पर सिद्धिप्रदे । कालातीता काली कमला तू वरदे ॥10॥ शक्ति शक्तिधर तू ही नित्य अभेदमयी । भेद प्रदर्शनी वाणी विमले वेदत्रयी ॥11॥ हम अति दीन दुखी मां विपत जाल घेरे । हैं कपूत अति कपटी पर बालक तेरे ॥12॥ निज स्वभाव वश जननी दया दृष्टि कीजे । करुणा कर करु...

Aarti shree har ghat ghat vasi

आरती श्री हरि घट घट वासी, श्री सच्चिदानंद सुखराशि।। पुरुषोत्तम नारायण स्वामी, करुणानिधि प्रभु अंतरयामी, कमलापति श्री विष्णु नमामि, मंगलमय बैकुंठ निवासी।।१।। आरती श्री हर घट घट वासी, श्री सच्चिदानंद सुखराशि।। आरती राघव राम जानकी, लखन भरत श्री हनुमान की, लंकापति कपि पति सुजानकी, रिपुसूदन अंगद बलराशि।।२।। आरती श्री हर घट घट वासी, श्री सच्चिदानंद सुखराशि।। आरती राधा कृष्ण मुरारी, नंद नंदन भक्तन हितकारी, केशव वासुदेव बनवारी, आरती कृष्ण चंद्र अविनाशी।।३।। आरती श्री हर घट घट वासी, श्री सच्चिदानंद सुखराशि।। आरती गिरिजा शंकर प्यारे, गणपति दुर्गा रवि शशि तारे, सकल देव सब संत हमारे, आरती सद्गुरू आनंदराशि।।४।। आरती श्री हर घट घट वासी, श्री सच्चिदानंद सुखराशि।। आरती शारद नारद स्वामी, काग भुषुंड गरुड़ सुखधामी, व्यास आदि सब देव नमामि, मंगल तुलसी मंगल राशि।।५।। आरती श्री हर घट घट वासी, श्री सच्चिदानंद सुखराशि।। जो कोई हरि जी की आरती गावे, सुख सम्पति आनंद घर आवे, आरती सब देवन सुखकारी, आरती अजर अमर अविनाशी।।६।। आरती श्री हर घट घट वासी, श्री सच्चिदानंद सुखराशि।।

Aarti bhagwat bhagwan ki

 श्री भगवत भगवान की है आरती, पापियों को पाप से है तारती। ये अमर ग्रन्थ ये मुक्ति पन्थ, ये पंचम वेद निराला, नव ज्योति जलाने वाला। हरि नाम यही हरि धाम यही, यही जग मंगल की आरती पापियों को पाप से है तारती॥ ॥ श्री भगवत भगवान की है आरती...॥ ये शान्ति गीत पावन पुनीत, पापों को मिटाने वाला, हरि दरश दिखाने वाला। यह सुख करनी, यह दुःख हरिनी, श्री मधुसूदन की आरती, पापियों को पाप से है तारती॥ ॥ श्री भगवत भगवान की है आरती...॥ ये मधुर बोल, जग फन्द खोल, सन्मार्ग दिखाने वाला, बिगड़ी को बनानेवाला। श्री राम यही, घनश्याम यही, यही प्रभु की महिमा की आरती पापियों को पाप से है तारती॥ ॥ श्री भगवत भगवान की है आरती...॥ श्री भगवत भगवान की है आरती, पापियों को पाप से है तारती।

Bal samay Ravi bhaksh

  बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारों | ताहि सो त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो | देवन आनि करी विनती तब, छाड़ि दियो रवि कष्ट निवारो | को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो | को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो || १ || बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो | चौंकि महामुनि शाप दियो तब , चाहिए कौन बिचार बिचारो | कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो | को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो || २ || अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीश यह बैन उचारो | जीवत ना बचिहौ हम सो जु , बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो | हेरी थके तट सिन्धु सबै तब , लाए सिया-सुधि प्राण उबारो | को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो || ३ || रावण त्रास दई सिय को तब , राक्षसि सो कही सोक निवारो | ताहि समय हनुमान महाप्रभु , जाए महा रजनीचर मारो | चाहत सीय असोक सों आगिसु , दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो | को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो || ४ || बान लग्यो उर लछिमन के तब , प्राण तजे सुत रावन मारो | लै गृह बैद्य सुषेन समेत...

Man mein basakar Teri murti

  मन में बसाकर तेरी मूर्ति, उतारू में गिरधर तेरी आरती॥ करुणा करो कष्ट हरो ज्ञान दो भगवन, भव में फसी नाव मेरी तार दो भगवन, दर्द की दवा तुम्हरे पास है, जिंदगी दया की है भीख मांगती, मन में बसाकर तेरी मूर्ति, उतारू में गिरधर तेरी आरती॥ मांगु तुझसे क्या मै यही सोचु  भगवन, जिंदगी जब तेरे नाम करदी अर्पण, सब कुछ तेरा कुछ नहीं मेरा, चिंता है तुझको प्रभु संसार की, मन में बसाकर तेरी मूर्ति, उतारू में गिरधर तेरी आरती॥ वेद तेरी महिमा गाये संत करे ध्यान, नारद गुणगान करे छेड़े वीणा तान, भक्त तेरे द्वार करते है पुकार, दास व्यास तेरी गाये आरती, मन में बसाकर तेरी मूर्ति, उतारू में गिरधर तेरी आरती॥

Banke bihari Teri Aarti gaun

  श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं । आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी…॥ मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे, प्यारी बंसी मेरो मन मोहे । देख छवि बलिहारी मैं जाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी…॥ चरणों से निकली गंगा प्यारी, जिसने सारी दुनिया तारी । मैं उन चरणों के दर्शन पाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी…॥ दास अनाथ के नाथ आप हो, दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो । हरी चरणों में शीश झुकाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी…॥ श्री हरीदास के प्यारे तुम हो। मेरे मोहन जीवन धन हो। देख युगल छवि बलि बलि जाऊं। ॥ श्री बांके बिहारी…॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं। आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं।

Durga aarti

 जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी तुमको निशिदिन ध्यावत तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ॐ जय अम्बे गौरी जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी तुमको निशिदिन ध्यावत तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ॐ जय अम्बे गौरी मांग सिंदूर विराजित टीको जगमग तो मैया टीको जगमग तो उज्ज्वल से दोउ नैना उज्ज्वल से दोउ नैना चंद्रवदन नीको ॐ जय अम्बे गौरी कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै मैया रक्ताम्बर राजै रक्तपुष्प गल माला रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै ॐ जय अम्बे गौरी केहरि वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी मैया खड्ग खप्पर धारी सुर नर मुनिजन सेवत सुर नर मुनिजन सेवत तिनके दुखहारी ॐ जय अम्बे गौरी कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती मैया नासाग्रे मोती कोटिक चंद्र दिवाकर कोटिक चंद्र दिवाकर सम राजत ज्योती ॐ जय अम्बे गौरी शुंभ निशुंभ बिदारे महिषासुर घाती मैया महिषासुर घाती धूम्र विलोचन नैना धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती ॐ जय अम्बे गौरी चण्ड-मुण्ड संहारे शोणित बीज हरे मैया शोणित बीज हरे मधु कैटभ दोउ मारे मधु कैटभ दोउ मारे सुर भयहिन करे ॐ जय अम्बे गौरी ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी मैया तुम कमला रानी अगम निगम बखा...

Aarti kunj bihari ki

 आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥ गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला । श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला । गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली । लतन में ठाढ़े बनमाली भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥ ॥ आरती कुंजबिहारी की...॥ कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं । गगन सों सुमन रासि बरसै । बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग, अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥ ॥ आरती कुंजबिहारी की...॥ जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा । स्मरन ते होत मोह भंगा बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच, चरन छवि श्रीबनवारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥ ॥ आरती कुंजबिहारी की...॥ चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू । चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद, टेर सुन दीन दुखारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥ ॥ आरती कुंजबिहारी की...॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥ आरती कु...

Aarti Hanuman ji ki

 आरती कीजै हनुमान लला की आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की आरती कीजै जाके बल से गिरिवर कांपे रोग दोष जाके निकट न झांके अंजनी पुत्र महाबलदायी संतन के प्रभु सदा सहाई आरती कीजै हनुमान लला की आरती कीजै दे बीरा रघुनाथ पठाए लंका जारी सिया सुध लाए लंका सो कोट समुद्र सी खाई जात पवनसुत बार न लाई लंका जारी असुर संहारे सियारामजी के काज संवारे आरती कीजै हनुमान लला की आरती कीजै लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे आणि संजीवन प्राण उबारे पैठी पताल तोरि जम कारे अहिरावण की भुजा उखाड़े बाएं भुजा असुरदल मारे दाहिने भुजा संतजन तारे आरती कीजै हनुमान लला की आरती कीजै सुर नर मुनि जन आरती उतारे अंजनी जय जय जय हनुमान उचारे कंचन थार कपूर लौ छाई आरती करत अंजना माई जो हनुमान जी की आरती गावे बसी बैकुंठ परमपद पावै आरती कीजै हनुमान लला की आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की आरती कीजै हनुमान लला की आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की आरती कीजै हनुमान लला की दुष्ट दलन रघुनाथ कला की आरती कीजै ...

Vishnu aarti

 ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट दास जनों के संकट क्षण में दूर करे ॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे॥ जो ध्यावे फल पावे -दुःख बिनसे मन का स्वामी दुःख बिनसे मन का सुख सम्पति घर आवे सुख सम्पति घर आवे कष्ट मिटे तन का ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥ मात पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी स्वामी शरण गहूं मैं किसकी तुम बिन और न दूजा तुम बिन और न दूजा आस करूं मैं जिसकी ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥ तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी स्वामी तुम अन्तर्यामी पारब्रह्म परमेश्वर पारब्रह्म परमेश्वर तुम सब के स्वामी ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥ तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता स्वामी तुम पालनकर्ता मैं मूरख फलकामी मैं सेवक तुम स्वामी कृपा करो भर्ता ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥ तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति स्वामी सबके प्राणपति किस विधि मिलूं दयामय किस विधि मिलूं दयामय तुमको मैं कुमति ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥ दीन-बन्धु दुःख-हर्ता ठाकुर तुम मेरे स्वामी रक्षक तुम मेरे अपने हाथ उठाओ अपने शरण लगाओ द्वार पड़ा तेरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥ विषय-विकार मिटाओ पाप हरो देवा स्वमी पाप(कष्ट) हरो देवा श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ सन्तन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हर...

Shiv arti

 जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओंकारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा ओम जय शिव ओंकारा ओम जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओंकारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा ओम जय शिव ओंकारा एकानन चतुरानन पंचांनन राजे स्वामी पंचांनन राजे हंसानन गरुड़ासन हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ओम जय शिव ओंकारा दो भुज चारु चतुर्भूज दश भुज ते सोहें स्वामी दश भुज ते सोहें तीनों रूप निरखता तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहें ओम जय शिव ओंकारा अक्षमाला बनमाला मुंडमालाधारी स्वामी मुंडमालाधारी त्रिपुरारी धनसाली चंदन मृदमग चंदा करमालाधारी ओम जय शिव ओंकारा श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगें स्वामी बाघाम्बर अंगें सनकादिक ब्रह्मादिक ब्रह्मादिक सनकादिक भूतादिक संगें ओम जय शिव ओंकारा करम श्रेष्ठ कमड़ंलू चक्र त्रिशूल धरता स्वामी चक्र त्रिशूल धरता जगकर्ता जगहर्ता जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता ओम जय शिव ओंकारा ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका स्वामी जानत अविवेका प्रणवाक्षर के मध्यत प्रणवाक्षर के मध्य ये तीनों एका ओम जय शिव ओंकारा त्रिगुण स्वामीजी की आरती जो कोई नर गावें स्वामी जो ...

Satyanarayan arti

 जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । रत्‍‌न जडि़त सिंहासन, अद्भुत छवि राजै । नारद करत निराजन, घण्टा ध्वनि बाजै ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो । बूढ़ा ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी । चन्द्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरी ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही । सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर-स्तुति कीन्हीं ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो । श्रद्धा धारण कीन्हीं, तिनको काज सरयो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । ग्वाल-बाल संग राजा, वन में भक्ति करी । मनवांछित फल दीन्हों, दीनदयाल हरी ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल, मेवा । धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई न...

Hanuman chalisa

 श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि बरनऊं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन कुमार बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहुं लोक उजागर रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवनसुत नामा महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी कंचन बरन बिराज सुबेसा कानन कुंडल कुंचित केसा हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै कांधे मूंज जनेऊ साजै संकर सुवन केसरीनंदन तेज प्रताप महा जग बन्दन विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया राम लखन सीता मन बसिया सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा भीम रूप धरि असुर संहारे रामचंद्र के काज संवारे लाय सजीवन लखन जियाये श्रीरघुबीर हरषि उर लाये रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई सहस बदन तुम्हरो जस गावैं अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा जम कुबेर दिगपाल जहां ते कबि कोबिद कहि सके कहां ते तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना लंकेस्वर भए सब जग जाना जुग सहस्र जोजन...